Blog:  ये कैसा  मृत्युभोज ? आइए अपने हिस्से का फर्ज़ निभा लें,  देखना फिर कहीं देर न हो जाए !

Blog: ये कैसा मृत्युभोज ? आइए अपने हिस्से का फर्ज़ निभा लें, देखना फिर कहीं देर न हो जाए !

Blog: माफ कीजिएगा दोस्तों ! आज आपको मेरे शब्द कुछ कठोर लग सकते हैं….कुछ को मेरी बातें बुरी भी लग सकती हैं और कुछ के लिए प्रेरणा भी बन सकती हैं, और शायद आज कुछ का मन निष्छल प्यार देने वाले बूढ़े मां-बाप के लिए पिघल भी सकता है। कुछ को अपने बचपन के दिन भी याद आ सकते हैं जब मां उनकी ओर से की गई गलती पर भी सबके साथ सिर्फ इसलिए झगड़ती थी ताकि उनके बच्चे पर कोई आंच न आ सके….क्योंकि उसे लगता था कि आप इतने भोले हैं कि कोई गलती कर ही नहीं सकते…..शायद किसी को आज वो दिन भी याद आ सकता है जब बचपन में आपके पिता जी ने आपकी एक डिमांड पर आपकी मनपसंद साईकिल लेकर दी थी और जब आपने कॉलेज में एडमिशन लिया था…तो हो सकता है आपके पिताजी ने आपकी पसंद की बाइक या कार या कुछ और आपको सरप्राइज गिफ्ट दिया होगा….ऐसा एक बार नहीं कितनी ही बार अपनी हैसियत के मुताबिक आपकी ख्वाहिशें पूरी की होंगी…और न जानें उन दिनों पिताजी कब पिता से दोस्त बन गए थे, और मां दुनियां की सबसे प्यारी मां…..,और हो सकता है आपकी लव-स्टोरी को पूरा करने में भी उन्होंने आपका साथ दिया होगा और जिनकी अरेंज मैरिज हुई उनके लिए भी मां-बाप दोनों ने कितने ही सपनें बुने होंगे। अपनी हैसियत के मुताबिक कितनी ही धूमधाम से आपकी शादी की होगी। अपनी जमा पूंजी या उधार लिए पैसे आपकी शादी को यादग़ार बनाने के लिए लगा दिए होंगे। मां ने भी अपनी बहू के लिए ज़ेवर, सूट, साड़ियां कितने ही चाव से खरीदी होंगी…..याद आया !!! क्या दिन थे वो ?…..लेकिन इसके बाद क्या ? जिन्होंने आपके बचपन से आज तक आपके हर निर्णय में, हर मोड़ पर, हर मुश्किल में, आपका साथ दिया आज उनकी आवाज़ तक सुनने में आपको गुस्सा आता है।

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असल में आज लोग ये भूलते जा रहे हैं कि मां-बाप कितने कष्ट उठाकर बच्चों का पालन-पोषण करते हैं। अपने बच्चे को खाना खिलाए बिना उनके हलक से निवाला नहीं उतरता। उन्हें कुछ मिले न मिले लेकिन अपने बच्चों की इच्छाएं पूरी करने के लिए अपनी जमा पूंजी की एक-एक पाई तक बच्चों पर लगा देते हैं। उनके करियर के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं, लेकिन जैसे ही बच्चा बड़ा होता है, अपने पैरों पर खड़ा होता है, उसकी शादी हो जाती है, उनके बाल-बच्चे हो जाते हैं, तब एकदम से वो अपने मां-बाप को एक तरफ कर देते हैं और बहाने क्या बनाते हैं ?  कि जेनरेशन गैप है, वो पुराने ख्यालों के हैं, हमें समझते नहीं हैं, कभी कहते हैं कि मामला तो सास-बहू की अनबन का है, हम क्यों बीच में पड़ें। कभी कहते हैं कि इस उम्र में वो सठिया गए हैं इसलिए उन्हें इग्नोर करना शुरु कर देते हैं। तो कभी उन्हें अपने पास न रखने का ये बहाना लगाते हैं कि मां-बाप दूसरे शहर के माहौल में एडजस्ट नहीं कर पाते इसलिए वो गाव में ही रहें तो अच्छा है, और न ही उनके खाने की कोई फिक्र करते हैं और न ही उनके बूढ़े शरीर और कांपते हाथों से कोई सहानूभूति रखते हैं, ये ज़रा भी नहीं सोचते कि क्या वे दोनों अब खाना बना पाने, नहाने-धोने या बाज़ार से सब्जी-तरकारी लाने में सक्षम है ? उनका स्वास्थ्य क्या उन्हें आज भी सभी काम खुद करने की इजाज़त देता है ?

शहर में अपने साथ रखने से उनके स्टैंडर्ड में कमी आ जाती है। अगर पास रख भी लें तो घर के किसी कोने में एक पूरानी गठरी की तरह पड़े मां-बाप अब बेकार की चीज़ बनकर रह जाते हैं। इंतज़ार होता है तो बस कब ये गठरी घर से बाहर निकले तो घर से बदबू आना बंद हो। वह भूल जाते हैं कि उनके भी बच्चे एक दिन बड़े होंगे और वह भी उनके साथ वैसा ही करेंगे जो वह अपने मां-बाप के साथ कर रहे हैं।

आज 70 से 80 फीसदी मामलों की पड़ताल करने से ये साबित हो चुका है कि सैंकड़ों मामले हैं जहां बच्चों ने अपनी शादी से पहले या शादी के बाद अपने मां-बाप की उपेक्षा की है और उन्हें सताया है, उनकी जायदाद हथिया ली है, उनकी सेवा करना तो दूर की बात, अपने ही बच्चों ने उन्हें पराया कर दिया। इसी वजह से आज वृद्धाश्रम में कितनी ही संख्या में बुजुर्ग भरे पड़े हैं…। जहां वो अपनी अंतिम सांसे गिन रहें हैं। अपने घर की याद आते ही एक अजीब से दर्द में डूब जाते हैं। उफ्फ….एक वाक्या याद आता है 2009 में जब मैं चंडीगढ़ एक अखबार के लिए बतौर Press Correspondent काम करती थी…एक दिन मेरे एडिटर ने मुझे कहा “आज तुम चंडीगंढ़ के किसी Old Age Home  की स्टोरी कवर करके लाओ”… Old age homes कैसे होते हैं ये देखना मेरे लिए पहला experience था, उस दिन मैं एक वृद्धाश्रम को visit करने गई, यक़ीन मानिए वहां जाकर ऐसा लगा कि मैं किसी और ही दुनियां में आ गई हूं…..जहां चारों ओर हमारे दादा-दादी की उम्र के बूढ़े और बीमार लोग ही थे…..उनमें से कुछ रामायण या भगवद्गीता पढ़ रहे थे….कुछ बुज़ुर्ग महिलाएं स्वेटर बुन रहीं थी, जब पूछा तो उन्होंने बताया कि अपने पोते के लिए बुन रहीं हैं…

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तो कुछ अपने बेटे के लिए…और कुछ इतने बीमार कि अपनी अंतिम सांसे गिन रहे थे…..जैसे-जैसे मैं सबके पलंग के पास से गुज़रती गई…उनकी हालत देखकर मेरी आंखें अपने आप ही छलकने लगी….जैसे-तैसे मैंने अपने आप को संभाला और कुछ से बात करने की कोशिश की…उनकी सेहत के बारे…उनके घर परिवार के बारे….और पूछा कि यहां आपको कैसे रखा जाता है….उनके घर से कोई उन्हें मिलने भी आता है या नहीं…..यक़ीन मानिए मुझे जो जवाब मिले उन्हें सुनकर मैं निशब्द थी….उनका बेटा-बहू उन्हें यहां छोड़ गए थे….और कभी कभार उनसे मिलने आ भी जाते थे…. महीने का उन्हें वृद्धाश्रम से Stipend मिलता था….वो भी सिर्फ 500 रुपये, ये साल 2009 की बात है..लेकिन उतने पैसे भी वो अपने पोते या पोती के लिए संभालकर रखते थे…..ताकि वो जब उनसे मिलने आएंगे तो वो बच्चों को प्यार दे सकें, या उनकी पसंद का खिलौना उन्हें मंगा कर दे सकें। मैं मन में सोच रही थी कि हे ईश्वर…ऐसे बच्चों के लिए आज भी कितना प्यार और कितनी ममता है उनके अंदर जिन्होंने उन्हें उनके ही घर से निकाल कर यहां छोड़ दिया है…..इन्होंने अपने बच्चों को पाल पोस कर बड़ा किया आज वो इन्हें दो रोटी तक नहीं खिला सकते….उन्हें ऐसी हालत में यहां छोड़ गए….उनके अंदर की संवेदनाएं बिल्कुल मर चुकी हैं क्या ?…वहां रह रहें अन्य बुजुर्गों से भी जब मैंने बात की तो एक चीज़ उन सब में मैने कॉमन पायी कि वो सब अपने घर को मिस कर रहे थे….हालाकि उन्हें यहां खाना-पीना, हेल्थ चेकअप, कपड़ा-बिस्तर सब कुछ मिलता था…लेकिन एक चीज की कमी थी वो थी प्यार की, अपनेपन की, सहानुभूति की….उन्हें उनके घर की बहुत याद सताती थी…जो सपनों का घर पूरी ज़िंदगी पाई-पाई करके उन्होंने बनाया था….जिसे बड़े ही प्यार से उन्होंने सवांरा था….अपनी पसंद की सारी सुख-सुविधाएं उन्होंने खरीदी थी आज उनपर उनका कोई हक नहीं था…..वे बेसहारा हो चुके थे….अपनी पुरानी यादें ताज़ा करते हुए उनकी धुंधली आंखों से टपकते आंसू मानों ये चींख-चींख कर कह रहे थे कि उन्हें उनके बच्चों के पास ही रहना है, उन्हें उनके घर की याद सताती है…कोई तो उनको वापिस ले जाओ….।

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वृद्धाश्रम के अध्यक्ष से बातचीत करने पर पता चला कि यहां बहुत लोग दान करने आते हैं….किसी के बच्चे का जन्मदिन हुआ तो यहां बच्चें के हाथों से मिठाई-केक खिलाने भी कई मां-बाप उन्हें ले आते हैं….( खैर, ये एक और मुद्दा है कि उनके लिए मिला दान, अनाज चाहे सरकारी या गैरसरकारी उन तक पूरा नहीं पहुंच पाता इस बारे में अगले आलेख में बात करेंगे।)

उस दिन वो बडे भावुक लम्हे थे जब वहां रह रहे बुज़ुर्ग अपने कांपते हाथों से मुझे दुआयें दे रहे थे..और अपने रख-रखाव सबंधी शिकायतें भी लगा रहे थे….मैं सोच रही थी कि काश उनके बच्चों के मन बदल जाएं और वो उन्हें बड़े ही प्यार, सम्मान और इज्जत के साथ, माफी मांग कर घर वापिस ले जाएं, नहीं तो काश मुझे कोई ऐसी पावर मिल जाए कि इन सबके बच्चों को ऐसा सबक सिखा सकूं कि वो सब अपने मां-बाप को वापिस ले जाएं और सपने में भी उनके साथ कभी बुरा न करें….।

खैर, कितने दुर्भाग्य की बात है जीते जी जिन मां-बाप की हम सेवा नहीं करते मरने के बाद उनके लिए मृत्युभोज करते हैं, उनका श्राद्ध मनाते हैं…इसमें भी हमारा स्वार्थ जुड़ा हुआ है ताकि मरने के बाद उनकी आत्माएं हमारी ज़िंदगी में कोई परेशानी न डालें इसलिए न जाने हम कितनी ही तरह के पूजा-पाठ, जप-तप, दान-पुण्य व श्राद्ध करने में विश्वास करते हैं ताकि पितृदोष न लगे, उनकी तृप्ति हो और उनसे मुक्ति मिले। क्योंकि हमें लगता है कि दान-पूण्य, श्राद्ध करने से हमारा जीवन धन्य हो जाएगा।

तर्क की कसौटी पर कुछ मुद्दों पर हम सबको संवेदनशील होना होगा…..मिलकर इस बारें में हमें ऐसे बच्चों के लिए ठोस कदम उठाने होंगे जो अपने मां-बाप के साथ हिंसा, दुर्व्यवहार करते हैं और उनकी संपत्ति हथिया कर उन्हें अकेला छोड़ देते हैं….सच में ये मुद्दा बेहद संवेदनशील है…मैं या आप अकेले कुछ नहीं कर सकते…सबसे पहले हम सबको अपने घर से इसका हल निकालना होगा फिर दूसरों को भी प्रोत्साहित करना होगा….जब सभी बच्चे अपनी ज़िम्मेदारियां समझ जाएंगे फिर मुझे नहीं लगता कि देश में कोई OLD AGE HOME होगा…असल में ये कॉन्सेप्ट हमारे देश का है ही नहीं….यहां तो ज्वाइंट फैमिली का कल्चर रहा है….जहां बड़े-बुजुर्गों की सेवा, उनका सम्मान, शर्म, लिहाज़ हमारे कर्तव्य माने जाते हैं…हमारी परवरिश में ही ऐसे संस्कार सम्माहित होते हैं….जिसका पोषण बचपन से ही हमारे लहू में दौड़ता है जहां बड़ो की इज्जत, छोटों से प्यार, महिलाओं का सम्मान करना हमारा फर्ज होता है…..।

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सच में ये मुद्दा सिर्फ ऐसे लेख लिख देने और पढ़ लेने तक ही सीमित नहीं है…अगर हम अपने मां-बाप के लिए नहीं करेंगे तो फिर किसके लिए करेंगे…कल उनकी बारी थी हमें संभालने की, आज हमारी बारी है उन्हें सहारा देने की, हम अपने बुजुर्गों के चले जाने के बाद खीर-पूरी कौवों को डालते हैं..उनकी मरने पर मृत्युभोज देते हैं…अपना ऊंचा स्टेटस दिखाने के लिए मृत्युभोज को भी किसी बड़े इवेंट की तरह ऑर्गेनाइज़ करते हैं….लेकिन ये कितना सही है उनके जीते-जी हम उन्हें दो वक्त की रोटी तक नहीं खिला सकते और मरने के बाद मृत्युभोज देते हैं, श्राद्ध करते हैं, मंदिर, मस्जिद, गुरद्वारों, गिरिजाघरों में उनके नाम के दान देकर आते हैं…..और लोगों के सामने धर्मात्मा कहलाते हैं। मेरी बात आज इस आलेख तक ही सीमित नहीं रहेगी इस बारे में मैं बार-बार तब तक आपको झकझोरती रहूंगी जब तक आप भी अपने बुजुर्गों के लिए स्टैंड लेने की शुरूआप अपने घर, अपने आस-पास से नहीं करेंगे। इस आलेख को पढ़ने के बाद  हो सकता है आप में से कई दोस्त ये कह रहे हों कि कहना आसान है लेकिन करना मुश्किल, यकीन मानिए बिल्कुल भी मुश्किल नहीं बस एक बात हमेशा याद रखना बचपन में जब आप छोटे थे तो अपने मां-बाप से कितने ही सवाल करते थे….ऐसे-ऐसे सवाल जिनका न तो कोई सिर-पैर होता था और न ही कोई मतलब….लेकिन फिर भी उतनी ही बार आपकी मां आपका माथा चूमकर आपको हर उत्तर दिया करती थी….तो फिर आज जब आप के पिता या आपकी माता बार-बार बोलती हैं या ज्यादा बोलती हैं तो फिर उन्हें चिढ़कर जवाब क्यों ? आज वो भी तो बच्चे की तरह हैं….उन्हें प्यार और सम्मान दीजिए….उनके पास बैठें, उन्हें सुनें….उन्हें ये यकीन दिलाएं कि चाहे आपकी ज़िंदगी में कोई भी आ जाए, उससे मां-बाप की जगह कोई नहीं ले सकता….उन्हें सुरक्षित महसूस करांये….खुद भी उन्हें सम्मान देंगे तो घर के बाकी सदस्य भी उन्हें सम्मान देगें….यकीन मानिए ये नुस्खा काम का है….।

 

Note: (आप अगर अपने सुझाव हमारे साथ सांझा करना चाहते हैं तो इस आलेख के नीचे दिए कमेंट बॉक्स पर टाइप कर सकते हैं। हमें अच्छा लगेगा यदि आप अपने विचार सबके साथ सांझा करेंगे। )

धन्यवाद  

संपादक- मनुस्मृति लखोत्रा

 

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