Blog: सबकी कॉपीज़ साफ हैंडराइटिंग में लिखी भरी-भरी सी नज़र आती लेकिन मेरी हड़बड़ाहट में लिखी कुछ अधूरी लाइनें मुझे अक्सर घूरती…!

Blog: सबकी कॉपीज़ साफ हैंडराइटिंग में लिखी भरी-भरी सी नज़र आती लेकिन मेरी हड़बड़ाहट में लिखी कुछ अधूरी लाइनें मुझे अक्सर घूरती…!

हमारी ज़िंदगी खुली किताब की तरह होती है जब चाहो बीते हुए कल का कोई भी पन्ना पलटो और उसमें से कुछ खूबसूरत पलों का आनंद ले लो…और बुरे पलों से सबक। मैं यदि उन सुनहरी पन्नों से अपने स्कूल के दिनों को याद करूं तो मेरी स्कूल लाइफ काफी टफ रही…..टफ मानें तो पढ़ाई में मैं बिल्कुल भी अच्छी नहीं थी…..ऊपर से कम नंबर लाने पर पिताजी का खौफ और रिपोर्ट कार्ड पर पेरेंट्स के साइन न करवाने पर टीचर का खौफ…उफ्फ……यूं लगता था मैं बेचारी नन्हीं सी जान जाऊं तो कहां जाऊं????..ये बात तब की है जब मैं शायद पांचवीं या छठी कक्षा में होंगी…वो तो शुक्र था कि पापा की पोस्टिंग दूर थी वो घर हफ्ते बाद ही आ पाते थे वरना तो रोज़ ही पिताजी से भी अच्छी-खासी पिटाई हो जाती…हा हा….मुझे आज भी याद आता है स्कूल से वापिस घर आने के बाद मम्मी के हाथों का स्वादिष्ट लंच खाने को मिलता था तो मानों पूरे दिन की स्कूल की थकान ही उतर जाती थी…..।

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Manusmriti Lakhotra
Writer & Editor – theworldofspiritual.com

अब मम्मी को क्या पता कि होमवर्क पूरा न करने पर दो-तीन पीरियड तो क्लास से बाहर ही खड़ा रहना पड़ता था…या फिर टीचर से पिटाई…तो थकावट तो होगी ही न ?….लेकिन जैसे ही शाम होती मेरे घर के आसपास की मेरी प्यारी सी सहेलियां, घर के बाहर से आवाज़ें लगाना शुरु कर देती….अरे खेलने में तो मुझे मुहारत हासिल थी ही, सो अब चाहे पकड़न-पकड़ाई हो, लुका-छिप्पी हो, खो-खो हो या फिर स्टापू मज़ाल है उसमें कभी हार मानी हो, और फिर उसके बाद भी मन नहीं भरता तो फिर होता था डांस….बड़ा ही मज़ा आता था…इतना मज़ा आता था कि स्कूल में टीचर की पनिशमेंट भी भूल जाया करती थी….।

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और रोज़ की तरह खेलते-खेलते फिर होमवर्क करना भूल जाया करती…मां भी क्या करे खेल कर जब घर जाती तब होमवर्क करने बिठा देती कि आज जब तक होमवर्क पूरा नहीं करेगी तू सोएगी नहीं…..लेकिन अब खेल-खेलकर थक ही इतना जाती कि होमवर्क करते-करते ही सो जाया करती,

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मेरा होमवर्क फिर से अधूरा रह जाता और हर सुबह फिर से खौफ के साथ नींद खुलती कि आज मैम को क्या बहाना लगाऊं??…होमवर्क तो आज भी पूरा नहीं किया…और सुबह-सुबह मम्मी के आगे फिर से वही कारण कि आज मैंने स्कूल नहीं जाना..मैम मारेगी मेरा होमवर्क पूरा नहीं हुआ है….उधर ऐसा सुनते ही मम्मी के चेहरे पर गुस्से के बादल घिरने लग जाते और उनकी तरफ से एक चाटा पड़ते ही अनमने मन से तैयार हो जाती…जैसे ही स्कूल रिक्शा वाला घर के बाहर आकर ट्रिन-ट्रिन बजाता वैसे ही मेरे दिल की धड़कने बढ़ने लगती…. आप सोच सकते हैं वो मंज़र कैसा होता होगा ?…. जैसे-जैसे स्कूल नज़दीक आता…फिर प्रेयर होती और फिर…..पहली क्लास….हिंदी वाली मैम की !!!….अटेंडेंस के बाद सबकी स्कूल होमवर्क की कॉपी कॉलैक्ट कर ली जाती….वो वक्त भी बड़ा ही खतरनाक होता जब सबकी कॉपीज़ साफ हैंडराइटिंग में लिखी भरी-भरी सी नज़र आती लेकिन मेरी कॉपी में हड़बड़ाहट में लिखी कुछ अधूरी लाइनें मुझे अक्सर घूरती …..और मैं सहम कर अपनी बारी आने के इंतज़ार में बैठ जाती..।

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ऐसे में जब क्लास की मॉनिटर मेरे डैस्क के पास आकर मुझसे मेरी कॉपी खींचती और मैं कहती अभी औरों की कॉलैक्ट कर लो मेरा कुछ काम अभी रह गया है…और वो ये कह कर मेरे हाथों से कॉपी खींच लेती “तो फिर घर से होमवर्क करके आना था ना” ???….कसम से वो भी मैम से कम नहीं थी उसका भी पूरा टैरर था…उसके बाद जब कॉपी चैक होती और मैम अपने पास बुलाती आगे आप खुद समझदार हैं….क्या होता होगा ?…हा हा….उसके बाद चार-पांच पीरियड जैसे-तैसे गुज़रते कि फिर आती रिसेस…और रिसेस में रोज़ाना क्लास में होता सिंगिंग या डांस कॉम्पीटिशन…. अहा !…भई इसमें तो सभी मुझे ही ढूंढते नज़र आते….और मैं एक कोने में फटाफट अपना टिफिन खत्म करके अपने डांस या गाने की भूमिका बना रही होती कि आज कौन सा गाना सुनाऊं।

खैर, पास तो मैं हर क्लास में हो ही जाया करती थी…..जैसे–जैसे क्लास आगे बढ़ती गई मुझमें पढ़ाई के प्रति गंभीरता बढ़ती गई…स्कूल के वो दिन अब याद आते हैं तो अच्छे भी लगते हैं और अपने ऊपर हंसी भी आती है…..

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लेकिन पढ़ाई के अलावा मेरा एक दूसरा पक्ष रहा…मल्टीटैलेंटिड होना…जिस वजह से स्कूल, कॉलेज में मुझे Debate, Poetry, Acting, One-Act Plays में participate करने और कॉलेज को कई बड़े स्तरों पर Represent करने का मौका मिला…..इन सबके बीच मुझे मेरे माता-पिता का पूरा सहयोग मिलता गया..जिस वजह से मेरी प्रतिभा में भी निखार आता गया…..बस फिर क्या था इसी बेस ने आगे चलकर मुझे मल्टीटास्किंग बनाया, करियर में चाहे वो Journalism, Social-Work या फिर Corporate Sector ही क्यों न रहा हो यही Skills मेरे काम आयीं और आज भी इसी बेस की वजह से मैं काम कर रही हूं। ऐसे और भी बहुत से बड़े उदाहरण हमारे आसपास हो सकते हैं जो बचपन में भले ही पढ़ाई में उतने अच्छे नहीं थे लेकिन बड़े होकर उन्होंने कामयाबी हासिल की और देश का नाम रोशन किया।

दरअसल, आपके करियर की बुनियाद आपके बचपन से ही बन जाती है…मैने अपने स्कूल के दिनों के जो पल आपके साथ शेयर किए हैं…हो सकता है आपका बचपन भी कुछ ऐसा ही गुज़रा हो या इससे बेहतर हो…या फिर आप क्लास के मॉनिटर ही क्यों न हों….हा हा…खैर, लेकिन मैं जानती हूं कि आपमें से कई मेरे दोस्तों की कहानीं भी मेरे साथ ही मेल खाती हो सकती है…और हो सकता है ये ब्लॉग पढ़कर आप अपने स्कूल के दिन याद करके मुस्कुरा भी रहे हों…लेकिन यहां आपसे अपने विचार सांझा करने का मेरा मकसद यही है कि ये ज़रूरी नहीं कि कम नंबर लाने वाले बच्चे कभी आगे नहीं बढ़ सकते…हो सकता हैं आप अपने बच्चे का जो पक्ष देख रहें हैं उसमें वो भले ही कमजोर हो लेकिन उसका दूसरा पक्ष भी ज़रूर देखें कि क्या पता वो स्पोर्ट्स में ज्यादा अच्छा हो…क्या पता उसके लिए खेल जगत की दुनियां बाहें फैलाए उसका इंतज़ार कर रही हो ?….या फिर कला के क्षेत्र में वो ज्यादा अच्छा हो…क्या पता आपका बच्चा एक अच्छा आर्टिस्ट, गायक, लेखक, कुशल वक्ता, साइंटिस्ट, इंजीनियर, डांसर या फिर कलाकार भी तो हो सकता है….बच्चा तो हीरे की तरह होता है…तराशना उसे आपको है…अगर उसे अपनी कला को निखारने का मौका नहीं देंगे तो फिर आपको क्या पता उसके अंदर छिपी क्षमताएं क्या हैं….?  

आप किसी दूसरे बच्चे के ज्यादा नंबर देखकर अपने बच्चे का अपमान न करें..बल्कि उससे बात करें…उसके मन की बात जानें कि वो क्या करना चाहता है…उसकी रूची किसमें हैं….उसके दोस्त बनें। स्कूल में तो कर्मयोगी ही तैयार होते हैं ये आपको समझना है कि आपका बच्चा अपने जीवन में कैसा कर्मयोगी बनेगा ? उसे उसके पथ में आगे बढ़ने के लिए साथ दें…आगे रास्ता अपने आप बनता चला जाएगा….। क्या पता आपका कम नंबर लाने वाला बच्चा आगे चलकर कुछ ऐसा करे कि लोग आपको उसके नाम से जानें ? एक बार सोचिएगा ज़रूर…।

धन्यवाद…।

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