Way to Spirituality : टेलीपैथी एक रहस्य है या छठी इंद्री का जागरण ? मस्तिष्क से निकली साइट्रॉनिक वेवफ्रंट तरंगों का इससे क्या संबंध है ? जानिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण !

Way to Spirituality : टेलीपैथी एक रहस्य है या छठी इंद्री का जागरण ? मस्तिष्क से निकली साइट्रॉनिक वेवफ्रंट तरंगों का इससे क्या संबंध है ? जानिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण !

इस विषय पर बात करने से पहले हमें ये जान लेना ज़रूरी है कि टेलीपैथी है क्या ? किसी भी उपकरण की मदद लिए बिना किसी के भी मन की बात जान लेना टेलीपैथी कहलाता है, यानिकि दूर बैठकर भी किसी भी व्यक्ति के मन की बात सुन सकते हैं, दूसरे स्थान की स्थिति को जान सकते हैं। इसलिए टेलीपैथी को दूरानुभूति भी कहते हैं।

अब ये भी जान लें कि टेलीपैथी शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल 1882 में फैड्रिक डब्लू एच मायर्स ने किया था। इस बारें में कई लोगों का मानना है कि छठी इंद्री की जागरण अवस्था को ही टेलीपैथी कहते हैं और इसे परामनोविज्ञान के साथ जोड़कर देखते हैं जिसमें टेलीपैथी के कई प्रकार बताए गए हैं, लेकिन इस बारे में भी सबके अलग-अलग विचार हैं इसलिए इस बारे में हम फिर चर्चा करेंगे जब हमें पुख्ता जानकारी हासिल हो पाएगी।

फिलहाल, वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर नज़र डालें तो कई वैज्ञानिकों ने इस बारे में कई रिसर्च किए हैं जिनकी जानकारी हम आपको आगे देंगे, वैसे हम आपको बता दें कि टेली शब्द से ही टेलीविज़न, टेलीफोन शब्द बनें हैं। जिस तरह ये सब उपकरण दूर से संदेश और चित्र को पकड़ने वाले यंत्र हैं ठीक इसी तरह इंसानी दिमाग में भी ऐसी ही क्षमता होती है। जब कोई व्यक्ति किसी के मन की बात जान ले या दूर घट रही घटना को पकड़कर उसका वर्णन कर दे तो उसे पारेंद्रिय ज्ञान कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि महाभारतकाल में संजय के पास भी यही क्षमता थी, जिससे उन्होंने दूर चल रहे युद्ध का वर्णन धृतराष्ट्र को सुना दिया था।

कुछ साल पहले वैज्ञानिकों ने इस बारे में कुछ रहस्यों को वैज्ञानिक आधार पर बताया था। 13 नवंबर 2013 को एक चर्चित हिंदी अखबार में छपे लेख के अनुसारः- “कुछ वैज्ञानिकों ने इस बारे में शोध किया था और उनका कहना था कि हम सभी भूत, भविष्य और भूत की घटनाओं को एक दर्पण की तरह देख सकते हैं। असल में प्रत्येक मानव के अंदर एक ऐसा जीन छुपा है होता है, जिससे उसे भावी घटनाओं का पता चल सकता है।

वैज्ञानिकों का मानना था कि मानव अपने मस्तिष्क के जरिए भविष्य की घटनाओं का पता आसानी से लगा सकता है। आमतौर पर हमें आज, अभी या अपने आसपास की घटनाओं की ही जानकारी होती है। आने वाले या बीत गए समय की अथवा दूरदराज की घटनाओं का पता नहीं चलता, लेकिन कोई विलक्ष्ण शक्ति है, जो व्यक्ति को समय और दूरी की सीमाओं की अतिक्रमण करते हुए उपयोगी सूचनाएं देती है।

विल्हेम वॉन लिवनीज नामक वैज्ञानिक का कहना था हर व्यक्ति में यह संभावना छिपी हुई है कि वह कभी-कभार चमक उठने वाली इस क्षमता को विकसित कर पूर्वाभास को सामान्य बुद्धि की तरह अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बना लेता है। इस तरह की क्षमता अर्जित कर सकता है, जब चाहे दर्पण की तरह अतीत या भविष्य को देख सके। 

अतीन्द्रिय ज्ञान को वैज्ञानिक आधार देते हुए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में भौतिकी के विद्वान एड्रियन डॉन्स ने कहा था कि भविष्य में होने वाली हलचलें मनुष्य के मस्तिष्क में एक प्रकार की तरंगें पैदा करती हैं। इन तरंगों को साइट्रॉनिक वेवफ्रंट कहा गया है। इन तरंगों के अहसास को मानव मस्तिषक के न्यूरान्स पकड़ लेते हैं। जिससे व्यक्ति भविष्य को जानने में या भविष्य में होने वाली कोई घटना के सही कथन को कहने में सफल होते हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक मस्तिष्क की अल्फा तरंगों और साइट्रॉनिक तरंगों की आवृत्ति एक सी होने के कारण सचेतन स्तर पर जागृत मस्तिष्क द्वारा ये तरंगे सहज ही ग्रहण की जा सकती हैं।

उस वक्त डरहम विश्वविद्यालय इंग्लैंड के गणितज्ञ एवं भौतिकीविद् डॉ. गेरहार्ट डीटरीख वांसरमैन का कहना था कि भविष्य का आभास या अतीत की घटनाओं का ज्ञान इसलिए होता रहता है, क्योंकि इनके संकेत समय-सीमा से परे मेंटल पैटर्न चिंतन क्षेत्र में मौजूद रहते हैं।

उनका मानना था कि ब्रह्माण्ड का हर घटक इन घटना तरंगों से जुड़ा होता है। ‘एक्सप्लोरिंग साइकिक फिनॉमिना बियांड मैटर नामक अपनी चर्चित पुस्तक में डी स्कॉट रोगो लिखते हैं, विचार धाराएं तथा भावनाएं प्राणशक्ति का उत्सर्जन (डिस्चार्ज ऑफ वाइटल फोर्स) हैं। यही उत्सर्जन अंत:करण में कभी-कभी स्फुरण बनकर प्रकट होते हैं। उत्सर्जन दो व्यक्तियों के बीच हो तो टेलीपैथी कहा जाता है और समय-सीमा से परे हो तो पूर्वाभास कहा जाता है”।

डरहम यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड के गणितज्ञ डॉ. गेरहार्ट वांसरमैन का कथन है, “मनुष्य को भविष्य का आभास इसलिए होता है क्योंकि विभिन्न घटनाक्रम टाइमलेस मेंटल पैटर्न के रूप में विद्यमान रहते हैं। ब्रह्मांड का हर घटक इन घटनाक्रमों से जुड़ा होता है, चाहे वह जड़ हो अथवा चेतन”।

संपादकः मनुस्मृति लखोत्रा

( इस आलेख में दी गई जानकारी विभिन्न स्त्रोतों से ली गई है जिसका उद्देश्य सामान्य जानकारी देना है )

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