“हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी की हर ख़्वाहिश पर दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले”: ग़ालिब

“हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी की हर ख़्वाहिश पर दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले”: ग़ालिब

Poetry Breakfast:- इश्क की अगर बात की जाए तो मिर्जा ग़ालिब का नाम सबसे पहले ज़ुबां पर आता है। कहते हैं कि इश्क ग़ालिब से ही शुरु होता है। ग़ालिब ने अपनी शायरी के ज़रिए बेपनाह मोहब्बत को अपने महबूब के सामने ज़ाहिर करने के लिए ज़ुबां दी।

‘इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के’ या फिर ‘दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है’, जैसी प्रसिद्ध शायरी  लिखी जिसे आज भी बातों ही बातों में किसी को भी दोहराते हुए सुन सकते हैं। अपनी ऐसी ही नायाब शायरी के लिए पहचाने जाने वाले मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib) ने इससे बढ़कर शेर, शायरियां, रुबाई, कसीदा और किताबें लिखें हैं जिन्हें जितनी बार पढ़ा जाए उतनी बार प्यार के कई मायने भी समझ आएंगे और शायरी के इस बेताज बादशाह ग़ालिब से प्यार हो जाएगा। आइए उनकी कुछ बेहद ही खूबसूरत नज्में पढ़ें, जिन्हें पढ़कर आप कह उठेंगे..वाह वाह….इरशाद….

  • दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
    आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
  • फिर उसी बेवफा पे मरते हैं
    फिर वही ज़िन्दगी हमारी है 
    बेखुदी बेसबब नहीं ग़ालिब
    कुछ तो है जिस की पर्दादारी है
  • अक़्ल वालों के मुक़द्दर में यह जुनून कहां ग़ालिब
    यह इश्क़ वाले हैं, जो हर चीज़ लूटा देते हैं…
  • बे-वजह नहीं रोता इश्क़ में कोई ग़ालिब
    जिसे खुद से बढ़ कर चाहो वो रूलाता ज़रूर है
  • हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी की हर ख़्वाहिश पर दम निकले
  • बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
  • हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
    जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
  • तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिला के दिखा
    नहीं तो दो घूंट पी और मस्जिद को हिलता देख
  • तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब
    के सारी उम्र अपना क़सूर ढूंढ़ते रहे
  • उनको देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक,
    वो समझते हैं के बीमार का हाल अच्छा है
  • इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश ग़ालिब
  • कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे
  • न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
    डुबोया मुझको होने ने न मैं होता तो क्या होता !
     

    हुआ जब गम से यूँ बेहिश तो गम क्या सर के कटने का,
    ना होता गर जुदा तन से तो जहानु पर धरा होता!

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