Happiness is Free: यदि आपके शब्दों का आपके विचारों के साथ तालमेल नहीं है तो आप दूसरों को विवादित ऊर्जा भेज रहे हैं !

Happiness is Free: यदि आपके शब्दों का आपके विचारों के साथ तालमेल नहीं है तो आप दूसरों को विवादित ऊर्जा भेज रहे हैं !

हम अक्सर दूसरों के विचारों, भावनाओं, शब्दों व कर्मों से प्रभावित होते हैं। किसी के द्वारा हमारे लिए कही गई बातें यदि हमारे लिए अच्छी हैं तो उसका हमारे ऊपर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और यदि बुरी हैं तो हमें अपने बारे में सुनकर बुरा लगता है। कोई भी व्यक्ति यदि किसी विचार या भावना को जन्म दे रहा है तो वह एक ऊर्जा के रूप में सामने वाले को दे रहा है। असल में शब्दों की ऊर्जाएं इसी प्रकार काम करती हैं व दूसरों को प्रेरित करती हैं।

अब जैसे आप अपने घर में अकेले हैं और आपके मन में ख्याल आया कि कोई भूत है आपके आसपास तो आपको वैसा ही महसूस होना शुरू हो जाएगा आपके अंदर एक अजीब सा भय घर कर जाएगा और आप किसी चीज़ के अचानक से हिलने से ही भय से भर जायेंगे। हमारे अंदर आए विचार हमें किस हद तक डरा हुआ या कमज़ोर कर सकते हैं इसका अंदाज़ा शायद आपको न हो लेकिन ये सच है। तो वहीं दूसरी तरफ एक बच्चे को आप कैसा बनाना चाहेंगे कमज़ोर, डरपोक या फिर निडर ये बहुत हद तक आप पर ही निर्भर करता है। जैसे हम यदि अपने बच्चे को उसके बचपन से ही बात-बात पर डराते रहेंगे, किसी डर या भय का वास्ता देकर उसके मन में एक डरावनी तस्वीर को बैठा देंगे तो वह बच्चा बचपन से ही डरपोक एवं दब्बू किस्म का बनना शुरू हो जाएगा। ऐसा करके हम उस बच्चे की ताकत बढ़ाने की बजाए उसे कमज़ोर बनाने का काम कर रहे हैं। ऐसी ही आदतों में एक और आदत डालकर हम बच्चों के गुनहगार बन रहे हैं और वो है उन्हें बचपन से ही जंक फूड व मोबाइल की आदत डालने की, अक्सर देखने में आया है कि आजकल माताओं से चार या पांच महीने का बच्चा चुप नहीं होता तो वह उसे माबाइल दिखा कर चुप कराती हैं। अनजाने में मासूम की आंखों से माताएं ही खिलवाड़ कर रहीं है, अगर बच्चा खाना नहीं खा रहा है तो जंक फूड खिलाकर आप उसकी जीभ का स्वाद तो बढ़ा रही हैं लेकिन उसके हार्ट, लीवर और किडनियों पर जंक फूड के खतरनाक असर डालने में कोई कमीं नहीं छोड़ रहीं हैं…। कुल मिलाकर आप बच्चों के साथ माथापच्ची करने से बचने के लिए एक तो उनकी आदत को बिगाड़ रही हैं और दूसरा उसके स्वास्थ्य को भी, खैर!

यानि कि आपके शब्द, आदतें, विचार, और भावनाएं एक-दूसरे से कितने जुड़े हुए हैं जिसमें से एक भी चीज़ गड़बड़ाने से सभी पर उसका अल्टा असर पड़ता है।

जबकि आपको चाहिए कि बच्चे को डराने की बजाए ऐसा कहें कि तुम सब काम कर सकते हो, तुम तो बहुत होशियार हो, मुझे तुम पर पूरा विश्वास है, भले ही आपको पता हो कि आपके बच्चे में इतना कैलीबर नहीं है लेकिन आपके द्वारा कहे गए शब्द बच्चे के दिमाग पर जल्दी असर डालते हैं।

अब यहां एक और बात की ओर ध्यान देने की ज़रूरत है कि आप जो कह रहे हैं क्या असल में आप सोचते भी वैसा ही हैं! अब जैसे आप अपने किसी दोस्त की तारीफ कर रहें हैं कि अरे वाह यार तुम्हें तो अच्छा इन्क्रीमेंट मिला है गुड, तुम डिज़र्व करते हो…लेकिन मन में आप कह रहे हैं अबे शिफारशी कहीं के….तो क्या आपके शब्दों और विचारों में तालमेल है ? नहीं, ऐसा करके आप सामने वाले को जो ऊर्जा भेज रहे हैं वह विवादित ही होगी….उस तक आप सकारात्मक बात तो पहुचां रहे हैं लेकिन अंदर से आप उसके प्रति सकारात्मक नहीं हैं, ऐसे में आपके चेहरे व आपकी भावनाओं से कहीं न कहीं सामने वाला भी विवादित ऊर्जा ग्रहण कर रहा है और आपके प्रति भी वैसी ही ऊर्जा वापिस लौटाएगा….क्योंकि जब हम कहते कुछ हैं और हमारे मन में कुछ और होता है तो ऐसे में हमारा चेहरा हमारी भावनाओं को दूसरे के सामने साफ बयां देता है, क्योंकि चेहरा एक आईने की तरह होता है जिसमें कोई भी अपने बारे में विचार साफ-साफ पढ़ सकता है। इसलिए बेहतर यही होगा की अपने शब्दों और विचारों में सही तालमेल बनाएं।

Image courtesy: Pixabay

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