Way to Spirituality: यदि आज आपका नाम दुनियां नहीं जानती तो क्या हुआ पर्दे के पीछे रहने वालों ने हमेशा इतिहास रचा है, दैवीय सत्ता को अपने पास महसूस कीजिए और खुश रहिए !

Way to Spirituality: यदि आज आपका नाम दुनियां नहीं जानती तो क्या हुआ पर्दे के पीछे रहने वालों ने हमेशा इतिहास रचा है, दैवीय सत्ता को अपने पास महसूस कीजिए और खुश रहिए !

अध्यात्मः कई बार ब्रहामांड के अद्भुत क्रियाकलापों, रहस्यों व नज़ारों के बारे में सोचा जाए तो सबकुछ कितना स्वपनील सा लगता है, ऐसा लगता है जैसे ये सृष्टि अपने अंदर करोड़ों प्रकार के अद्वितीय संगीत बजा रही है और कितने ही रहस्यमयी ढंग से अपने नियमों का पालन कर रही है, और ऐसा लगता है कि संसार में जो कोई भी काम हो रहा है वो सृष्टि के ही व्यवसाय हैं….और हम सृष्टि के इन व्यवसायों के विभिन्न विभागों में अपनी-अपनी डियूटी निभा रहें हैं….और इन सारे घटनाक्रमों का लेखा-जोखा किसी सुप्रीम पावर के हाथों हो रहा है….। अब देखिए न विभिन्न वाद्य यंत्रों को ही देखें सात सुरों से ही यदि हम चाहें तो कितनी तरह की धुनें तराश सकते हैं….चाहें क्लासिकल धुनें या फिर पॉप लेकिन उन्हीं धुनों से जब कोई दैवीय धुन छिड़ती है तो सारा का सारा वातावरण ही दैवीय हो जाता है….ये प्रकृति के ही तो राग हैं..रंग हैं…जो अलग-अलग वाद्य यंत्रों में अलग-अलग ध्वनि के रूप में हमें अपने सम्मोहन में कैद कर लेता हैं…

ठीक इसी तरह नीले आसमान का अपना ही आकर्षण हैं ये मदमस्त आसमां जब कभी सतरंगी छठा बिखेरता हैं तो मानों सतरंगी झूला झूलती मौसम की घटाएं अपना हुस्न किसी नवयौवना की तरह खुले आसमां में बिखरा देती हैं और हम प्रकृति की खूबसूरती और रहस्य को देखकर ठगे के ठगे रह जाते हैं…।

तो वहीं सुर जब मंदिर की घंटियों, ढोल नगाड़ों से निकलते हैं तो वह श्रद्धा व आस्था का रूप ले लेते हैं…और हमारा रोम-रोम दैवीय वातावरण में भीग जाता है। क्या आप जानते हैं आप जो भी कार्य करते हैं उसमें भी सुर है, रस है, आनंद है, कल्पना है, श्रद्धा व आस्था है….। वो घर जहां हम सुकून की नींद लेते हैं अपने परिवार के साथ जब कीमती पलों का अहसास हम लेते हैं। जहां हमारे सपने हकीकत में बदलते नज़र आते हैं वह एक मंदिर ही तो है…जिस विद्या के आलय में हम ज्ञानी व गुणी बनते हैं…शिक्षक हमें शिक्षा प्रदान करतें हैं….जहां हमारे भविष्य की बुनियाद रखी जाती है वह भी एक मंदिर ही तो है….जिस स्थान पर हम अपना व्यवसाय करते हैं….या जहां हम नौकरी करते हैं….वहां हम कर्मठ बनते हैं….अपने हुनर व काबलियत को और निखारते हैं….जहां से हम अपनी रोज़ी-रोटी कमाते हैं….अपने परिवार का पेट पालते हैं….वो भी मंदिर ही तो है….।

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मेरा कहने का तात्पर्य ही यही है कि दैवीय सत्ता का आभास हर जगह, हर कण में है, हमारे हरेक रोम में है। ये हो सकता है कि यदि आज आप ज्यादा सफल नहीं हो पा रहे हैं या आज भी आप एक गुमनाम जीवन व्यतीत कर रहे हैं…या हो सकता है आज आपका नाम लोग नहीं जानते हैं…आपको आपके कामों में लोकप्रियता हासिल नहीं हो पायी है लेकिन ज़रा ये भी तो सोचें कि पर्दे के पीछे काम करने वालों या मौन रहने वालों ने हमेशा इतिहास रचा है…बस आप अपना काम करते रहें….और अपने चारों ओर दैवीय शक्ति का आभास महसूस करते रहें देखना प्रकृति भी आपकी मदद करने लग जाएगी।

संपादक- मनुस्मृति लखोत्रा

Image courtesy : Pixabay

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