Way to Spirituality : मनुष्य के कर्मों का फल कब मिलता है, जानिए ?

Way to Spirituality : मनुष्य के कर्मों का फल कब मिलता है, जानिए ?

श्रीमद्भागवत गीता एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें आपको आपके हरेक प्रश्न का उत्तर मिल सकता है। हम सबके मन में इस बारे में हमेशा जिज्ञासा रहती है कि हमें हमारे कर्मों का फल कब मिलता है ? इसमें मनुष्य के पाप कर्मों का विश्लेषण किया गया है और बताया गया है कि जो व्यक्ति समस्त पाप कर्मों के फलों (बन्धनों) का अन्त करके भौतिक जगत् के द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है और भगवान् की भक्ति में लग जाता है उनके सारे पाप कर्म चाहे वे फलीभूत हो चुके हों, सामान्य हों या बीज रूप में हों, क्रमशः नष्ट हो जाते हैं।

जिस प्रकार जब बीज बोया जाता है तो वह तुरन्त वृक्ष नहीं बन जाता, इसमें कुछ समय लगता है। पहले एक छोटा सा अंकुर रहता है, फिर यह पौधे का रूप धारण करता है और उसके बाद वह वृक्ष बनता है। वृक्ष बनने के बाद ही इसमें फूल आते हैं, फल लगते हैं और तब बीज बोने वाले व्यक्ति फूल तथा फल का उपभोग कर सकते हैं।

इसी प्रकार जब कोई मनुष्य पाप कर्म करता है, तो बीज की ही भांति इसके भी फल मिलने में समय लगता है।इसमें भी कई अवस्थाएं होती हैं। भले ही व्यक्ति में पाप कर्मों का उदय होना बन्द हो चुका हो, भले ही उसने पाप कर्म करना बंद कर दिया हो किन्तु पूर्व में किए गये पाप कर्म का फल तब भी मिलता रहता है। कुछ पाप तब भी बीज रूप में बचे रहते हैं, कुछ फलीभूत हो चुके होते हैं, जिन्हें हम दुख तथा वेदना के रूप में अनुभव करते हैं।

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