Blog: प्रकृति जब करेगी सफाई अभियान,  फिर न कहना प्रकृति को गुस्सा क्यों आया ?

Blog: प्रकृति जब करेगी सफाई अभियान, फिर न कहना प्रकृति को गुस्सा क्यों आया ?

सावन के आते ही चारों और प्रकृति दुल्हन की तरह सजने संवरने लग जाती है…..जैसे किसी प्रिय की शादी के जश्न की तैयारियां कर रही हो…..इन दिनों कुदरत कुछ इस क़दर मेहरबान हो जाती है कि मौसम का नज़ारा देखते ही बनता है….आसमान में बादल भी घूमड़-घूमड़ आते हैं और ऐसे गरज़ते हैं कि जैसे नगाड़े बजा रहे हों और किसी बड़े जश्न में शामिल होने का न्यौता दे रहे हों….बरखा भी जैसे बरस बरसकर चारों और धुलाई का काम पूरा कर रही हो…।

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इन दिनों नई खिली पेड़ों की कोपलें और वर्षा से धुले-धुले से पेड़-पौधे, फूल-पत्ते ऐसे निखर जाते हैं जैसे किसी नवयौवना को रूप चढ़ आया हो या फिर किसी की शादी में शरीक होने के लिए बन-ठन कर बारातियों की तरह तैयार खड़ें हों……और हो भी क्यों न आखिर सावन में प्रकृति भी तो शिव विवाह की तैयारियों में जुटी होती है….!

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ऐसे में शिव के भक्त भी कहां पीछे रहने वाले हैं…..अभी कुछ दिन पहले भगवान भोले के भोले भक्त और गंगा मां के पुत्र दूर-दूर से बड़ी ही श्रद्धा और भक्ति के साथ ओम नमः शिवाय, बम-बम बोले का जाप करते हुए देवभूमि हरिद्वार पहुंचे। गंगा घाट, हर की पैड़ी पर उमड़ा भक्तों का सैलाब देखने लायक था। शिव के भोले, भगवान शिव को रिझाने, अपना प्यार, अपनी भक्ति, आस्था और स्मर्पण उन तक व्यक्त करने के लिए कठिन से कठिन तरीके से कावड़ यात्रा करते हुए अपने पहले पड़ाव यानि हर की पैड़ी पर पहुंचे। इसके बाद मां गंगा की गोद से दुलार, आर्शीवाद और जल लेकर अपने प्यारे शिव भोले के चरणों में नतमस्तक होने और जल चढ़ाने नीलकंठ पहुंचे।

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देवभूमि में शिव भक्तों का ऐसा सैलाब बिखरा कि चारों ओर बम-बम बोले के जयकारों से पूरा उत्तराखंड गूंज उठा…भक्त बड़ी ही दूर-दूर से ढोल-नगाड़े, डीजे बजाते हुए हरिद्वार से लेकर नीलकंठ तक अपने भोले को पुकारते हुए नज़र आए…और ऐसा हो भी क्यों न आखिर भगवान शिव के भक्त उनसे मिलने जो आए थे……शिवरात्रि पर नीलकंठ में शिवजी पर जल चढ़ाकर कितनी ही मन्नतें मांगते हुए और अगले बरस फिर से आने का वचन देते हुए कावड़ यात्री अपने-अपने घरों की ओर लौट गए…..अरे वाह ! कितना ही शानदार और यादगार रहा होगा उन सबके लिए ये सफर……ऐसा नज़ारा सिर्फ इस बार नहीं बल्कि हर साल देखने को मिलता है…और सिर्फ साल में एक बार नहीं बल्कि बार-बार देखने को मिलता है क्योंकि हर महीने किसी न किसी स्नान का आयोजन यहां हो ही जाता है…और भक्त पूजा-पाठ, स्नान, श्राद्ध, अस्थि विसर्जन आदि कर्मकांड को करने के लिए पूरा वर्ष पतितपावनी मां गंगा के पास आते ही रहते हैं…..।

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लेकिन अपने आप को शिव भक्त कहने वालों, पवित्र गंगा को मां कहने वालो…..जाते-जाते कुछ सवालों के जवाब तो देते जाओ ???….ये मैं नहीं पूछ रही…ये सवाल मां प्रकृति के भी हो सकते हैं…..क्योंकि इन दिनों प्रकृति ने जो भगवान शिव के विवाह की तैयारियां की थी आप वो सब बेकार कर गए….यहां काम करने वाले सफाई कर्मचारियों के अलावा प्रकृति ने भी इन दिनों बारिश से जो देवभूमि की सड़कें, घाट साफ किए थे आप सब वो फिर से गंदा कर गए…..यहां से दर्शन करके जाने के बाद अगर आपकी थकान उतर गई हो तो ज़रा गंगा नगरी और नीलकंठ तक जाने वाले रास्तों की सुध तो ले लीजिए……दरअसल, इन दिनों तीर्थनगरी हरिद्वार व ऋषिकेश, गंगागाट, पार्किंग स्थल, हाईवे, शहरों की गलियां ही नहीं चारों तरफ गंदगी का अंबार लगा हुआ है….सड़कों पर दुर्गंध और कूड़े के ढेरों के कारण लोगों का आना-जाना मुश्किल हो गया है….यहां तक कि इन शहरों में वायरल का संक्रमण तक फैल गया है…..।

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मेरा इस बारे में बात करने का उद्देश्य सिर्फ उन से है जो यहां आए और गंदगी फैलाकर गए…मैं नहीं जानती कि प्रशासन की क्या तैयारियां रही होंगी……मुझे सिर्फ आपसे शिकवा है….आप जिनकी भक्ति करते हैं….जिनके दर्शन करने के लिए आप पूरा एक साल कांवड़ यात्रा का इंतज़ार करते हैं….गंगा मां से जल लेकर शिव भोले पर चढ़ाने जाने जाते हैं….लेकिन ये कहां तक सही है आप खुद उस पवित्र स्थान को गंदा करके जाते हैं….ये कैसी आस्था….ये कैसी भक्ति…आपको क्या लगता है ऐसा करने से भगवान शिव आपसे खुश होंगे ?….ये माना जाता हैं कि इस धरती पर कोस-कोस की दूरी पर देव निवास करते हैं……आप देवभूमि उत्तराखंड में दर्शन करने आते हैं या देवों की भक्ति को भंग करने…..क्या आप जानते हैं हर की पैड़ी से नीलकंठ जाने तक के रास्ते में राजाजी नेशनल पार्क का रास्ता आता है….ये दुर्लभ वन्य जीवों और पक्षियों का सुरक्षित स्थान है खासतौर पर टाइगर और हाथियों का इलाका…जो लोग वाया चीला होकर नीलकंठ जाते हैं….यानीकि वह जंगली जीवों के घर के बीच में से निकल कर जाते हैं…..जब आप इतनी ज़ोर से डीजे चलाकर वहां से गुज़रते हैं तब वहां रह रहे जानवर और पक्षी डर जाते हैं…और शोर सुनकर इधर-उधर भागने लग जाते हैं…..पूरे जंगल की पूरी तरह से चार दीवारी नहीं हैं….ऐसे में इन जानवरों का शहर की ओर पलायन करने का खतरा बढ़ जाता है……या मुसाफिरों पर हमला भी कर सकते हैं….. सिर्फ इतना ही नहीं आप पहाड़ों की शांति को भी भंग करते हैं…..क्या आप जानते हैं इस पूरे इलाके में कितने ही आश्रम हैं….कितने ही वृद्ध लोग इन आश्रमों में अपनी ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव में यहां रहने आते हैं…यहां कई ऐसे जंगल भी हैं जहां कई ऋषि-मुनि कई वर्षों से समाधि लिए हुए हैं….ध्वनि प्रदूषण और पर्यावरण प्रदूषण फैलाकर आप सिर्फ अपने स्वार्थ और अपनी खुशी के लिए कितनो को नुकसान पहुंचा रहे हैं…जिनमें सबसे पहले तो गंगा के सभी घाट, हाईवे, सड़कें, पेड़-पौधे, पहाड़, हरिद्वार से ऋषिकेश-नीलकंठ तक के सभी रास्ते, जंगली जानवर, पंछी, बच्चे-बूढ़े, ऋषि-मुनि-सन्यासी, सफाई कर्मचारी और स्थानिय जनता आदि सब शामिल हैं…..जिनके आप सब गुनाहगार हैं…..।

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हरिद्वार से लेकर नीलकंठ तक, सभी रास्तों पर सब सड़ी-गली सामग्री, प्लास्टिक-पॉलीथिन, गीले-कपड़े, पुरानी कांवड़, चप्पल-जूते, डिसपोज़ल, क्रॉकरी, सड़ा-गला फल, फूल, खुले में जगह-जगह शौच आदि बिखरा पड़ा है। प्रशासन ने जगह जगह शौच आदि के लिए भी प्रबंध किए लेकिन करोड़ों की तादाद में आएं लोगों के लिए वे काफी न थे…..लेकिन ये कहां तक जायज़ है कि इन घाटों पर ही शौच किया जाए???? ज़रा सोचिए वहां स्नान कौन कर पाएगा??…..इन जगहों पर काम करने वाले सफाई कर्मचारी भी कितना कूड़ा उठाएंगे….जहां इन चंद दिनों में करोडों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे हों….हरिद्वार शहर एक छोटा सा शहर है…. उसमें इतनी संख्या में लोगों को संभालने की क्षमता नहीं है…..क्या आप जानते हैं जब-जब यहां पर कोई भी स्नान होता है तो इन जगहों पर स्थानिय निवासियों के लिए सब रास्ते बंद कर दिए जाते हैं…दफ्तरों, स्कूल, कॉलेजों की छुट्टी कर दी जाती है…..ताकि आप सबके आने जाने के लिए सारे रास्ते खोल दिये जाएं और आप जाते-जाते यहां इतनी गंदगी फैला जाते हैं कि आपके जाने के बाद यहां के लोग गंदगी से पैदा हुए संक्रमण का शिकार हो जाते हैं…..प्रशासन चाहे जितनी भी तैयारियां करे वो भी कम पड़ जाएंगी यदि हम नहीं समझेंगे। ये हम सबका फर्ज़ भी बनता है कि हम जब भी इन तीर्थ स्थानों पर दर्शन करने जाएं अपनी तरफ से गंदगी न फैलाएं….पुराने कपड़े यहां फैंक कर जाने से कोई फायदा नहीं किसी गरीब को दान में दें तो उससे दुआएं तो मिलेंगी….यहां फैंकेगे तो प्रकृति के कोप के भागीदार ही बनेंगे….।

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क्या आप जानते हैं इसबार आप सिर्फ हरिद्वार में ही 2500 मीट्रिक टन कूड़ा फेंक कर गए हैं….वैसे आम दिनों में हरिद्वार में 200 मीट्रिक टन कूड़ा होता….इतने कूड़े का निस्तारण करना भी यहां नगर निगम के लिए किसी चुनौती से कम नहीं। एक अखबार में छपे लेख के मुताबिक यहां 35 बीघा में फैले 19 करोड़ 37 लाख की लागत से बना कूड़ा निस्तारक संयंत्र बन तो चुका है लेकिन अभी तक शुरू नहीं हो पाया है…..शहर का कूड़ा भी कितने ही सालों से सराय गांव स्थित डंपिंग ग्राउंड व अन्य जगहों पर फैंका जा रहा है…..इतनी बड़ी मात्रा में कूड़े के ढेरों में संक्रमण का खतरा यहां मंडराता रहता है….हालांकि यहां पर समय-समय पर कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है लेकिन कितना बचाव हो पाएगा….और दूसरा बरसात के दिनों में जब भारी बारिश होती होगी तो ज़ाहिर सी बात है शहर के गंदे नाले व गीले कचरे का बहाव पवित्र गंगा में जाता होगा…..। इसमें कोई दो राय नहीं कि कितने वर्ष पहले ऐसे तीर्थस्थानों में प्रशासन की ओर से सबसे पहले गंदगी और कचरे के निस्तारण का प्रबंध हो जाना चाहिए था, क्योंकि प्रशासन को ये अच्छी तरह से पता है कि यहां गंगा नगरी होने के कारण पूरा साल श्रद्धालू बड़ी संख्या में आते रहते हैं और नमामि गंगे योजना के तहत गंगा को साफ करने पर बार-बार ज़ोर दिया जा रहा है…..लेकिन ज़ोर देने और बाते करने से कुछ नहीं बनेगा साहब ! आपको करके दिखाना होगा….।

याद रखें कि प्रकृति जब अपना सफाई अभियान शुरू करती है तो फिर उसे रोकने वाला कोई नहीं होता….वो गिन-गिन कर अपना बदला लेती है…..क्योंकि जब आप प्रकृति की खूबसूरती को गंदा करेंगे तो उसका जवाब तो आपको देना ही होगा……आप फिर कौन से रिश्ते से अपने आपको शिव भोले के भोले कहते हैं???? आप फिर किस तरह से अपने आप को मां गंगा के पुत्र कहते हैं??? क्या पुत्र साल में एक बार अपनी मां के पास जाएगा और उसे गंदा करके आएगा ?…..खैर मां  गंगा तो युगों-युगों से सबकी गंदगी धोती आ रही है….चाहे जानवर हो या मृत हो सबको अपनी शरण में जगह देती आ रही है…वो आगे भी ऐसा ही करती रहेगी……क्योंकि वो गंगा मां है…..लेकिन अपनी और से एक कदम तो आगें बढ़ाएं…अपनी हिस्से का फर्ज़ निभाएं…..जब भी किसी तीर्थ स्थान में जाएं तो उतना ही अपने साथ सामान लाएं जिसे आपको खुले में फैंकना न पड़े….सफाई नहीं कर सकते तो…..तो कुछ फैंके भी न….अगर फैंकना भी पड़ जाए तो डस्टबीन में फैंके….अगर वो भी न मिले तो एक कैरी बैग अपने साथ रखें जिसमें फैंकने वाला सामान डालते रहें और जहां भी डस्टबीन दिखें वहीं फैंके…..आप में से जो भी तीर्थ स्थानों पर गंदगी फैलाकर जाते है मुझे नहीं लगता कि उससे मां गंगा या भगवान शिव खुश होते होंगे…..।

कृपा करके अपनी प्रकृति को बचा लें….अपने हिस्से का फर्ज़ निभा लें…..हरिद्वार से कांवड़ मेला संपन्न होने के बाद इन जगहों पर जब नगर निगम के सामने गंगा घाटों में इतने टन कूड़ा साफ करना एक बड़ी चुनौती बन गया  तो कई आश्रम, स्वयं सेवी संस्थाएं, औद्धयोगिक संस्थाएं, महाविद्यालय, स्थानिय निवासी सफाई के लिए आगे आए हैं….जो कि एक सराहनिय कदम है।

आज वचन दें कि आगे से किसी भी तीर्थ स्थान में जाकर आप अपनी तरफ से कहीं भी गंदगी नहीं फैलाएंगे….और यदि किसी को गंदगी फैलाते देखें तो कृपा उसे रोकें या शिकायत करें। आप, मैं और हम सब भी अपने आप में सोशल एक्टिविस्ट हो सकते हैं…अगर अपने आप से भी शुरुआत कर देंगे तो देखना गांव, शहर, नदियां पहाड़ अपने आप ही स्वच्छ होते चले जाएंगे। जहां प्रशासन का सवाल है तो उन्हें इस बारें में जल्द से जल्द और पुख्ता कदम उठाने होंगे….।

 

संपादकः मनुस्मृति लखोत्रा

Image courtesy: pixabay

 

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