Janmashtami Special: “सम्भवामि युगे युगे”…

Janmashtami Special: “सम्भवामि युगे युगे”…

#सम्भवामि_युगे_युगे_02

“जब संसार दु:खों और तकलीफ से चित्कार करता हुआ —आर्त्तनाद करते हुए प्रकट या अप्रकट रूप से ‘ त्राहि माम् ! त्राहि माम् ! ‘ करने लगता है ( शास्त्र इसे गौ के रूप में पृथ्वी का ब्रह्मा के पास जाना कहते हैं) तो एक ऐसे वातावरण की सृष्टि होती जो एक संवेदनशील एवं उन्नत दम्पत्ति के मस्तिष्क-केंद्र को धर दबाती है, उसे अनुकम्पित करती है. उन्ही के मिलन में परित्राता ( Saviour) की आत्मा उतर आती है. जरायु में भ्रूण वृद्धि-प्राप्त करने लगता है. इसे शास्त्र क्षीरसागर में शेषनाग पर बैठे विष्णु के रूप में चित्रित करते हैं जिनके पैर लक्ष्मी (वृद्धि) दबा रही हैं. जन्म के वक़्त से ही परित्राता पूर्ण जागृत रहते हैं — पूर्ण वृद्धि प्राप्त जिनका न कभी ह्रास होता है और न विकास. यह परमपुरुष ही देश एवं सभ्यता के प्राणपुरुष होते हैं.” — श्रीश्री ठाकुर अनुकूलचंद्र जी

“….. Wailing out of suffering creates an atmosphere -, this incantation grabs a good pair (couple) of brains, the soul of the Saviour comes down there, a zygote lying amidst placenta and chord begins to grow. To use the mythologi¬cal expressions, Narayan is lying in the sea of nectar, Laksmi is stroking his feet, he becomes awake on the day of his birth, and the tingling of his greatness become evident from that very day. Such a man is the life and brain of the nation.”
– Sri Sri Thakur Anukulchandra ji ( ‘Who Thou The Revolutionary’)

#सम्भवामि_युगे_युगे_03

” मैं पुनः कहता हूँ
अच्छी तरह्‌ खोज-बीन
समझ कर देखो—
ईश्वर का कोई सम्प्रदाय नहीं है.

जो प्रेरित-पुरुष हैं
वे भी
किसी सम्प्रदाय को उपलक्ष कर नहीं आते हैं,
इसीलिए, उनका भी कोई सम्प्रदाय नहीं है;
हिन्दु ही कहो,
बौद्ध ही कहो,
मुसलमान ही कहो,
ईसाई ही कहो,
प्रत्येक ही
धर्म के उपासक हैं;

जो प्रेरित पुरुष हैं
प्रत्येक ही
वैशिष्ट्यपाली आपूरयमाण हैं;
वे वैशिष्ट्य को
विशेष में ही उन्नीत करते हैं–
और भी
अभिदीप्ति लिये;

व्यष्टिगत भिन्नता है ही,
और, इस विभिन्नै की
एकायित संगति भी है,
दुनिया में एक के जैसी
दूसरी चीज किन्तु नहीं हे,
फिर भी, हू-ब-हू एक समान नहीं रहने पर भी
सदृश है,
एक शब्द में ——
प्रत्येक का ही
निजस्व ढंग है;
जाति, वर्ण, गुण एवं कर्म का
अनुबन्धन है,

वैशिष्ट्य का ऐतिह्य-सांस्कारिक
गुण एवं कर्म में विनायित विशिष्ट व्यक्तित्व है;
और जितने हैं सब कुछ के अस्तःस्थ होकर वे हैं–
उत्सर्जनी जीवन एवं वृद्धि में
खरस्रोता ( तीव्र-श्रोता ) होकर;
किसी वैशिष्ट्य को भी वे तोड़ते नहीं,
वे प्रत्येक विशेष के ही आपूरयमाण हैं ;
इसीलिए प्रत्येक विशेषत्व के आपूरयमाण हैं,–
ऐसा चिर दिन ही है,

इसीलिए वे
वैशिष्ट्य-पाली आपूरयमाण हैं;
प्रेरित-पुरुष ही कहो,
अवतार ही कहो,
जो आते हैं–
उसी एक के ही वे अवतरण हैं:
इस मानव देह में
वे मानव होकर आने पर भी
सारी दुनिया के हर विशेष के प्रति
करुणा-निर्झर हैं;

एक के बाद दूसरे जो आते हैं –
वे पूर्वतन के ही नव-कलेवर हैं;
एक की अवज्ञा करना
सभी की अवज्ञा करना हे,
क्योंकि वे भिन्न होकर भी – एक हैं;

हम सम्प्रदाय गढ़ते हैं.
भ्रान्ति का दुर्ग निर्माण करने के लिए.
एक-एक, विशेष भाव लेकर
जो एक साथ चलते हैं–
जाति-वर्ण एवं वैशिष्ट्य-अनुसार उत्सर्जना में
उनको लेकर ही समाज बनता है;

हर व्यष्टिगत जीवन में ही धर्म है,
प्रत्येक ही विहित उत्सर्जना में
उनकी उपासना करता है–
अपनी बोध-विनायित कृति-तत्परता से–
जो अपने उपास्य प्रेरित-पुरुष
या अवतार पुरुष की दिशा में
उनके मुताबिक़ लिये चलता है —
अस्खलित, निष्ठानन्दित,
उद्दाम उत्सर्जना की सृष्टि कर
कृति-सन्दीपना सहित;

प्रत्येक अस्तित्व ही
प्रत्येक अस्तित्व की
संगतिशील सन्दीपना है —
जिसके द्वारा
प्रत्येक ही प्रत्येक को जानता है-
प्रत्येक का जो कुछ विशेषत्व है, उसे लेकर
हर उद्भावना की अनुभावित उर्जना में;
उस निष्ठा के द्वारा कृति-सन्दीपनी परिचर्या में;
एक दूसरे को उच्छल कर
बोध-विकास का
प्रांजल लीलायित लास्य लिये उपभोग करता है
प्रत्येक प्रत्येक को;

जो असत्‌ हैं,
जो हिंस्र हैं,
वे
उसका विच्छेद लाते हें,
इसी लिए प्रत्येक ही असत्‌ -निरोधी होकर भी
आपूरणी-संवेगी है.

इसीलिए कहता हूँ,
दिल में जैसे रहे, स्मरण रखो,
भूल मत जाना,
ईश्वर एक हैं, धर्म एक है;
व्यक्ति के रूप में विशेष विनायन से
विशेष के अन्दर वे प्रकट होकर रहते हैं;
प्रेरित-पुरुष
या अवतार पुरुष या पुरुषोत्तम:
जो भी कहो न–
वही एक,
स्व॒तःसंदीप्त धारयिता एवं पालयिता जो हैं.
जो ईश्वर हैं, जो अधिपति हैं,–
उनके ही वास्तव भाव अभिषिक्त
गुण-सन्दीप्त नवकलेवर हैं,

एवं प्रत्येक अवतार पुरुष ही
देश-काल-पात्र एवं युग-उपयोगी
जहाँ जेसा प्रयोजन है
वैसी अनुशीलन अनुदीपना में
उद्दीप्त कर मनुष्य को
सार्थक करने आते हैं;

और जो निष्ठानन्दित हैं–
अनुगति-कृतिसंवेग की
श्रमप्रिय तत्परता से कृतियोग में
उन्हें उपभोग कर सार्थक हो उठते हैं;

मैं कहता हूँ–
तुम भी सार्थक हो ।”

-श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचंद्रजी
( आदर्श-विनायक, वाणीसंख्या–238 )

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