यादग़ार लम्हेंः उनकी मखमली और भारीपन लिए हुए आवाज़ में प्यार के दर्द को बयां करने का एक ऐसा तिलिस्म था जिसने भी सुना वो ठगा रह गया !

File: चिट्ठी न कोई संदेस, न जाने वो कौन सा देस, कहां तुम चले गए... जी हां ग़ज़ल की दुनियां के वो फनक़ार जिनकी आवाज़ का जादू ऐसा चला कि…

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Poetry Breakfast: “कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए, कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए”: गज़लकार दुष्यंत कुमार

1. हुज़ूर आरिज़-ओ-रुख़्सार क्या तमाम बदन मिरी सुनो तो मुजस्सम गुलाब हो जाए उठा के फेंक दो खिड़की से साग़र-ओ-मीना ये तिश्नगी जो तुम्हें दस्तियाब हो जाए वो बात कितनी…

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Poetry Breakfast: जिनकी कविताओं का सुरूर जब चढ़ता है तो दिल से सिर्फ एक ही आवाज़ आती है “कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है”: कुमार विश्वास

हिंदी काव्य मंचों से अपनी पहचान बनाने वाले लोकप्रिय कवि डॉ. कुमार विश्वास जिनकी कविताएं हर युवा के दिल में बसती है। उनका कविताओं और शायरी में संवाद पेश करने…

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Poetry Breakfast: जब खूबसूरती चांदी और सोने जैसी लगने लगे तो वहीं से गज़ल बनती है “चांदी जैसा रंग है तेरा, सोने जैसे बाल”…

ये दौर भी बेहद खूबसूरत था जब महान गज़ल गायक पंकज उधास ने 1980 के दशक में एक अलग किस्म की गज़ले पेश की। उस समय ग़ज़ल गाने वाले कई…

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Poetry Breakfast: 80 के दशक के एक ऐसे फनकार जिनकी रूहानी आवाज़ आज भी दिलों पर देती है दस्तकः मोहम्मद अज़ीज़ साहब

लेख सेक्शनः मोहम्मद रफी के बाद मोहम्मद अज़ीज एक ऐसे गायक थे जिन्हें गायकी में रफी साहब का वारिस माना जाने लगा। मोहम्मद अज़ीज़ का जन्म 1954 में पश्चिम बंगाल…

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Poetry Breakfast: “घुँघर वाली झेनू वाली झुन्नू का बाबा, किस्सों का कहानियों का गीतों का चाबा”: “पोटली बाबा की”

लेख सेक्शनः ये उन दिनों की बात है जिन दिनों देश में इकलौता टीवी चैनल दूरदर्शन हुआ करता था। ये 90 का दशक था, तब न ही तो केबल टीवी…

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Poetry Breakfast: हमारे हाथों में इक शक्ल चांद जैसी थीः बशीर बद्र

गज़लः- एक चेहरा साथ-साथ रहा जो मिला नहीं किसको तलाश करते रहे कुछ पता नहीं शिद्दत की धूप तेज़ हवाओं के बावजूद मैं शाख़ से गिरा हूँ नज़र से गिरा…

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Poetry Breakfast: शर्मा बंधुओं का ये भजन आज भी तरुवर की छाया जैसा लगता है !

1974 में आई फिल्म परिणय का एक भजन बेहद लोकप्रिय हुआ था, खैर, उस वक्त मैं तो नहीं थी लेकिन बचपन में पिता जी अक्सर टेपरिकॉर्डर में इस भजन को…

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Poetry Breakfast: इक कुड़ी जिदा नाम महोब्बत गुम हैः शिव कुमार बटालवी

आईए आज उस दशक की बात करें जब कविताएं आत्मा की गहराईयों से लिखी जाती थी। कविता का एक–एक लफ्ज़ शायर के लिए किसी इबारत से कम नहीं होता था।…

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